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प्रत्येक व्यक्ति समस्त दुःखों से छूटना चाहता है और दुःख रहित नित्यानंद को प्राप्त करना चाहता है । उसका यह लक्ष्य पूरा हो सकता है, जब वह गंभीरता से गहरे चिंतन मनन से ध्यान के माध्यम से दुःखों के स्वरूप, कारण और निवारण के विषय में जानकारी करे तथा साधनों, उपसाधनों को संग्रह करते हुए तदानुकूल आचरण करे ।

महर्षि वेदव्यास ने गीता में कहा है- “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” अर्थात् “ज्ञान के सदृश पवित्र वस्तु संसार में दूसरी नहीं है।” ज्ञान से अविद्या मिटती है तथा बुद्धि निर्मल होती है। निर्मल बुद्धि से ही मनुष्य सदाचरण में प्रवृत्त होता है।

दर्शन योग महाविद्यालय की स्थापना के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि निष्काम भावना से युक्त मनसा, वाचा, कर्मणा एक होकर सर्वात्मना समर्पित व्यक्तियों का निर्माण करना है, जो अपनी और संसार की अविद्या, अधर्म तथा दुःखों का विनाश करके उसके स्थान पर विद्या, धर्म तथा सुख की स्थापना कर सकें ।

दर्शन योग महाविद्यालय के संस्थापक पूज्य स्वामी श्री सत्यपति जी परिव्राजक तथा उनके शिष्य-प्रशिष्य मंडली ने प्रवचन, शिविर, सम्मिलन, लेख, साहित्य के द्वारा उपरोक्त गंभीर विषय पर प्रामाणिक उत्तम विचार प्रस्तुत किए हैं । जीवन को जीने की कला सिखाई है ।

जनसाधारण को प्रामाणिक आर्ष ग्रंथ उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाना व विभिन्न प्रकार से प्रचार-प्रसार करना, इस वैदिक वस्तु भंडार का  मुख्य उद्देश्य है।

इस उदात्त धार्मिक कार्य में आप सभी विद्वानों का यथायोग्य सहयोग अपेक्षित है। हमारी योजना निकट भविष्य में वेद, दर्शन आदि अनेक आर्ष ग्रन्थों के निःशुल्क वितरण की है । आगे भी यथा योग्य वितरण करता रहेगा । अनेक पुस्तक e-book माध्यम से यह उपलब्धि वर्तमान में निःशुल्क है । अन्य e-book(जो हार्ड पुस्तक रूप में प्रकाशित है ) अतिन्यून मूल्य में उपलब्ध कराया गया है ।

www.vedicbhandar.org वेबसाइट पर वैदिक आर्ष ग्रन्थों के साथ साथ वेदादि आर्ष-ग्रन्थों पर आधारित सामग्री, आध्यात्मिक साधन, व्यावहारिक साधन, चित्र (Picture), श्रव्य (Audio), चलचित्र (Video), प्रदर्शन (Presentation), लेखाचित्र (Infographics) आदि के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

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